मानवीय संवेनाओं और परिवारिक मूल्यों को सजीव करता नाटक “जीवन आशा”

आज के बदलते परिवेश में पारिवारिक रिश्तों में तनाव और आधुनिकता समाज परिवारिक मूल्यों में आ रहे गिरावट को मंच पर सजीव करता नाटक “जीवन आशा” जिसके लेखन और निर्देशन किया है मधुर जैन ने।

ये नाटक माता-पिता के द्वारा संतान के प्रति अतुल्य प्रेम और निष्ठा को दर्शाता है। जहां मां- बाप अपने बेटे पर सरवास्य निछावर कर रहे होते है और पुत्र उनके प्रेम का बदला विश्वासघात करता है। जो आज के परिवारिक परिवेश की ओर भी इशारा करता है।

माता-पिता जीवन के अंतिम दौर तक बेटे का इंतजार करते रहते है और पुत्र नहीं आता। घर से लेकर वृद्धाश्रम तक का सफर तय करने के बाद भी जीवन भर आशा की डोर नहीं टूटती और लगता रहता है कि आज बेटा लेने आएगा । बूढ़े हाथ अपने नाती पोतों को दुलारने की आस में ही दम तोड़ देते हैं । लेकिन उन्हें कोई लेने नहीं आता।

नाटक यतार्थ का सजीव चित्रण करता है। परिवार की स्थिति और टूटते रिश्ते पर आधारित नाटक अपने सफल मंचन से दर्शकों सराहना का केंद्र रहा।

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