भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के जीवनी पर आधारित पुस्तक “भिखारी ठाकुर: कुतुबपुर से कुतुबपुर”

भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के जीवनी पर आधारित पुस्तक “भिखारी ठाकुर: कुतुबपुर से कुतुबपुर” को भिखारी ठाकुर के परिवार से “रामदास रही” ने लिखा है। इसका संपादन वरिष्ठ लेखक रंगकर्मी हरिवंश ने किया है। प्रस्तुत है पुस्तक के संपादकीय परिप्रेक्ष्य :

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पुस्तक:-“भिखारी ठाकुर: कुतुबपुर से कुतुबपुर” 

लेखक:- रामदास राही

संपादक:- हरिवंश

संपादकीय परिप्रेक्ष्य

इस पुस्तक को संपादित करते हुए मैंने पाया कि रामदास राही लिखित पुस्तक ‘ भिखारी ठाकुर: कुतुबपुर से कुतुबपुर’ एक अनपढ़ गंवई व्यक्ति के साहित्यकार, नाटककार, कलाकार और रंग निर्देशक के साथ-साथ सांस्कृतिक योद्धा बनने की संघर्षगाथा है। रामदास राही भिखारी ठाकुर की बड़ी बहन के पोते हैं, जो भिखारी ठाकुर के धरोहर को संरक्षित करने के लिये 50 वर्षों से सक्रिय हैं। इन्होंने भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों पहलुओं को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है; हालाँकि रामदास राही की शिक्षा किसी विश्वविद्यालय में नहीं हुई है, लेकिन व्यावहारिक रूप में भिखारी ठाकुर के साहित्य को पढ़ने के साथ उनके नाटकों के प्रदर्शन तथा भिखारी ठाकुर की नाट्य मंडली के कलाकारों की जीवन यात्रा को वे करीब से देखते रहे हैं। भोजपुरी साहित्यकारों, उनके साहित्य तथा सभा- गोष्ठियों से भी इनका जीवन्त संवाद रहा है। ‘लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम, कुतुबपुर’ के सचिव के नाते भी लोक साहित्यों के अध्ययन तथा शोधार्थियों को सहयोग देने की प्रक्रिया में इन्होंने भिखारी ठाकुर के अवदानों को गहनता से समझा है।

बिहार के छपरा जिले के सर्वाधिक पिछड़े इलाके गंगा के दियारा स्थित कुतुबपुर गांव में पैदा हुए भिखारी ठाकुर की जीवन यात्रा नाई परिवार में पैदा होने के चलते पैतृक पेशे से गुजरती हुई सांस्कृतिक योद्धा बनने के साथ कुतुबपुर में ही आकर समाप्त होती है।

भिखारी ठाकुर की जीवन यात्रा को रामदास राही आठ हिस्सों में बांटते हुए पाठकों को समझाना चाहते हैं कि किस तरह से एक अनपढ़ युवक तीस वर्ष की उम्र में नाट्य कला के क्षेत्र में रंगकर्मी के साथ नाटककार, रंग निर्देशक बनने के निर्णय को व्यावहारिक रूप देता है और भोजपुरी में संगीत रूपक ( संगीत प्रधान दृश्य- काव्य) को सामने लाता है; और फिर नये नाट्य शिल्प ‘ बिदेसिया’ को गढ़ने में सफल होता है।

इस पुस्तक में भिखारी ठाकुर की नाट्य रचनाओं के अलावा उनके भजन-कीर्तन तथा अन्य फुटकर रचनाओं को संदर्भित करते हुए, उन्हें समझने का प्रयत्न किया गया है। 18 दिसम्बर 1887 ( जन्म) से लेकर 10 जुलाई 1971 ( निधन) तक की जीवन यात्रा में 1917 से 1965-66 तक की उनकी सक्रिय कला और साहित्यकर्म का विवरण और विश्लेषण पुस्तक में है। कैथी लिपि में लिखी उनकी मूल पाण्डुलिपि को परिजनों द्वारा प्रकाशित कराने के दृष्टिकोण से तत्कालीन मुख्यमंत्री को सौपें जाने और उसके गुम हो जाने के बाद नये सिरे से उनकी रचनाओं को प्रकाशित कराने की संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का जिक्र भी है।

मूलतः देखा जाय तो सामाजिक-आर्थिक रूप में कमजोर परिवेश से आये भिखारी ठाकुर की सम्पूर्ण रचनाओं में नारी और दलित विमर्श की आख्या है, सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों का चित्रण है। सच कहे तो भोगे हुए यथार्थ तथा भक्ति आंदोलन के प्रभाव को समेटे उनकी तमाम रचनाएं हैं। उनमें मनुष्यता के बोध के प्रति चिन्ता है और मनुष्य के कल्याण का भाव आदर्श के रूप में है।

  भिखारी ठाकुर अपने नाटकों और सामाजिक धार्मिक उपदेश को हथियार बनाकर एक तरह से सामाजिक-आंदोलन को खड़ा करते हुए दिखते हैं, जिनके सहयोद्धा गंवई कलाकार हैं, जो मूलतः जीविकोपार्जन के लिये हलवाही, चरवाही, बनिहारी करने वाले मजदूर, गरीब किसान थे। एक तरह से देखें तो ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में सामंती संरचना के बीच से निकलकर सामाजिक विसंगतियों पर चोट करने वाले ये कलाकार बहुसंख्यक जनता के बीच लोकप्रिय हो गये थे। कहीं न कहीं वे दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करने में सफल थे, जिनके चलते उनकी नाट्य प्रस्तुतियों को देखने दसियों हजारों की भीड़ कोसों दूर से खींची चली आती थीं। दर्शकों के रूप में महिलाओं की तादाद भी बढ़ने लगी थीं, जो भिखारी ठाकुर के नाटकों में अपने जीवन दास्तान को तलाश रही होती थीं।

रामदास राही ने भिखारी ठाकुर के व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन संघर्षों के चित्रण तो किया ही है, उन पक्षों पर भी खास ध्यान आकर्षित किया है कि गांव का एक युवक पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर में अपने जीविकोपार्जन के लिये जाता है और वहां रामलीला, रासलीला और ‘जात्रा’ से प्रभावित होकर कैसे गांव लौटकर रामलीला मंडली तैयार करता है और फिर शुरू हो जाता है नाट्य कर्म का चमत्कृत प्रयोग। भिखारी ठाकुर पूर्ववर्ती तथा समकालीन अभिनय-नृत्य और गायन कला को आत्मसात करते हुए ठेठ गंवई अंदाज में उनका मौलिक सृजन करने में सफल होते हैं, जो देशज माध्यमों से दर्शकों को ज्यादे ही प्रभावित करती हैं। पुस्तक उन पक्षों पर विवेचना प्रस्तुत करती है, जिनमें भिखारी ठाकुर की नाट्य शैली किस तरह की मंचीय संरचना को सामने लाती है और फिर लगातार अपने नये प्रयोगों से सजती-संवरती लोकप्रिय हो जाती है। भिखारी ठाकुर के सक्रिय दौर में भी उनको उपेक्षित करने के कुप्रयास चलाये जाते रहे, जिनका जवाब भी उन्होंने ‘ शंका समाधान’ पुस्तक लिख कर दिया तथा वे लगातार नये-नये नाटकों और भोजपुरी काव्य- साहित्य का सृजन करते गये। आज जब शहरों के बुद्धिजीवी ‘ बिदेसिया शिल्प’ को या मूलतः भिखारी ठाकुर के कलाकर्म को नाच की संज्ञा देते हैं, तब वे भिखारी ठाकुर के उस व्यक्तव्य पर ध्यान नहीं देते जब वे कहते हैं कि ‘ बिदेसिया नाच ना ह खेला; तमासा ह’ ; लेकिन तथाकथित रंगकर्मियों, शोधार्थियों को भिखारी ठाकुर के नाटकों की कथावस्तु तथा उनमें निहित पात्रों के कार्यव्यापार केवल लौंडा नाच के रूप में दिखते हैं! आंगिक-वाचिक संवाद जो विभिन्न स्थायी भावों से गुजरते हैं, या कारुणिक परिदृश्य में चल रहे संवाद भी उन्हें ‘नाच’ दिखायी पड़ते हैं! अब तो दिल्ली, पटना के महान ‘बुद्धिजीवी’ , ‘शोधजीवी’ ; भिखारी ठाकुर के नाट्य प्रदर्शनों को ‘ लौंडा नाच’ से भी जोड़ने लगे हैं। वे अब पुरुष नर्तकों द्वारा स्त्री वेश-भूषा में अश्लील अंगप्रदर्शनों को एक अद्भुत और चमत्कृत करने वाली कला के रूप में महिमामंडित करते हुए दिखते हैं।

 

क्रमशः ■ हरिवंश

 

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